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बस्ती का ‘दवा घोटाला’: कागजों पर चली करोड़ों की दवा, अस्पताल में एक गोली तक नहीं!

मास्टरमाइंड का खेल: खाली डिब्बों में भर दिया सरकारी बजट, हर्रैया अस्पताल में बड़ी लूट!

अजीत मिश्रा (खोजी)

भ्रष्टाचार का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: 100 बेड वाले अस्पताल में कागजों पर दौड़ रही करोड़ों की दवाएं!

  • जादुई अस्पताल: यहाँ दवाएं आती नहीं, सिर्फ करोड़ों के बिल पास होते हैं!
  • भ्रष्टाचार की ‘कीमोथेरेपी’: मरीजों के हक पर सप्लायर और अधिकारियों का डाका!
  • साहब! दवा तो बहाना है, असली मकसद सरकारी खजाना है!
  • सीएमएस और सप्लायर की ‘जुगलबंदी’: ऑडिट के 4 लाख और करोड़ों का घोटाला साफ!
  • जेम पोर्टल का ‘जाल’: चहेते ठेकेदारों को एल-1 और जनता को ठेंगा!
  • अस्पताल नहीं, ‘लूट का अड्डा’: हर्रैया से लेकर बस्ती तक फैला भ्रष्टाचार का सिंडिकेट!

उत्तर प्रदेश।

बस्ती। प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे सफेदपोशों का एक और कारनामा सामने आया है। हर्रैया स्थित 100 बेड वाले महिला अस्पताल में सेवा और उपचार के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, वह किसी बॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है। यहाँ बीमारों का इलाज हो न हो, लेकिन सरकारी खजाने का ‘इलाज’ बड़ी ही बेरहमी से किया जा रहा है।

कैसे होता है ‘एक का दो’ का जादुई खेल?

​भ्रष्टाचार की इस ‘मॉडस ऑपेरेंडी’ को जानकर किसी भी आम आदमी का खून खौल उठेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, यहाँ ‘एक डिब्बे की दवा को दो डिब्बे बनाना’ ही असली मुनाफा है। सप्लायर और अस्पताल प्रशासन की जुगलबंदी कुछ ऐसी है कि स्टॉक में रखी दवाओं के आधे पत्ते निकालकर खाली डिब्बों में भर दिए जाते हैं। नतीजा? कागजों पर स्टॉक डबल हो जाता है, और जनता के टैक्स का करोड़ों रुपया सीधे भ्रष्टाचारियों की तिजोरी में चला जाता है।

इन चेहरों पर उठी उंगली: मिलीभगत या संगठित गिरोह?

​इस सनसनीखेज खुलासे में कई रसूखदार नामों का जिक्र है:

  • सीएमएस सुषमा जायसवाल: जिनके संरक्षण में कथित तौर पर यह पूरा खेल फल-फूल रहा है।
  • ध्रुव वर्मा (चीफ फार्मासिस्ट): स्टोर की चाभी और स्टॉक के ‘जादूगर’।
  • डॉ. मनोज चौधरी (जेम पोर्टल प्रभारी): जिनके माध्यम से ‘मनपसंद’ सप्लायरों को एल-1 (L-1) कराकर टेंडर का बंदरबांट किया जाता है।
  • बाबू बजरंग प्रसाद और चहेते सप्लायर: जो इस संगठित लूट के सबसे मजबूत मोहरे बताए जा रहे हैं।

ऑडिट का ‘रेट कार्ड’: 2 परसेंट दो और क्लीन चिट लो!

​सबसे शर्मनाक बात यह है कि इस लूट को छिपाने के लिए ऑडिट टीम को भी ‘मैनेज’ करने की बात सामने आई है। रिपोर्ट का दावा है कि अगर साल भर में 2 करोड़ की फर्जी खरीद हुई, तो उसका 2% यानी 4 लाख रुपये ऑडिट वालों को थमाकर ‘ऑल ओके’ की मुहर लगवा ली जाती है। यानी, ऊपर से नीचे तक पूरा तंत्र इस भ्रष्टाचार की गंगा में हाथ धो रहा है।

समीक्षात्मक टिप्पणी: व्यवस्था की मौत और रसूखदारों का जश्न

​यह सिर्फ एक अस्पताल का घोटाला नहीं है, बल्कि उस भरोसे का कत्ल है जो एक गरीब मरीज सरकारी अस्पताल पर करता है। जब अस्पताल में ₹1 की दवा नहीं आती और भुगतान करोड़ों का हो जाता है, तो सवाल उठता है कि प्रशासन की आँखें क्यों बंद हैं?

​क्या शासन की सतर्कता टीमें सिर्फ फाइलों में दबकर रह गई हैं? अगर उच्च स्तरीय जांच हुई, तो कई सफेदपोशों के सफेद कुर्ते जेल की सलाखों के पीछे नजर आएंगे। हर्रैया का यह मामला केवल एक बानगी है; आशंका है कि जिला महिला अस्पताल बस्ती और अन्य केंद्रों पर भी इसी ‘आपूर्तिकर्ता गिरोह’ ने अपने जाल फैला रखे हैं।

निष्कर्ष: अब वक्त है कि इस ‘दवा माफिया’ और ‘अस्पताल के दीमकों’ पर कठोर कार्रवाई हो। कागजी दवाओं से मरीजों का पेट नहीं भरता, और न ही कागजी जांच से भ्रष्टाचार रुकता है। जनता जवाब मांग रही है!

– ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती।

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